MP के ‘कड़कनाथ’ मुर्गे को 6 साल के बाद मिला GI टैग, इसलिए है खास

मध्यप्रदेश के झाबुआ की पारंपरिक प्रजाति के कड़कनाथ मुर्गे को जियोग्राफिकल इंडिकेशन्स का तमगा मिल गया है। करीब साढ़े छह साल की लंबी जद्दोजहद के बाद झाबुआ के कड़कनाथ मुर्गे के काले मांस के नाम भौगोलिक पहचान (जीआई) का चिन्ह पंजीकृत किया गया है। इस निशान के लिए सहकारी सोसायटी कृषक भारती कोऑपरेटिव लिमिटेड (कृभको) के ग्रामीण विकास ट्रस्ट के झाबुआ केंद्र ने आवेदन किया था।

जियोग्राफिकल इंडिकेशन्स रजिस्ट्री की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के मुताबिक मांस उत्पाद और पोल्ट्री एवं पोल्ट्री मीट की श्रेणी में किए गए इस आवेदन को 30 जुलाई को मंजूर कर लिया गया है। यह जीआई पंजीयन सात फरवरी 2022 तक वैध रहेगा। ग्रामीण विकास ट्रस्ट के क्षेत्रीय कार्यक्रम प्रबंधक महेंद्र सिंह राठौर ने बताया, हमारी अर्जी पर झाबुआ के कड़कनाथ मुर्गे के काले मांस के नाम जीआई चिन्ह का पंजीयन की हमें औपचारिक सूचना मिल चुकी है।

स्थानीय जुबान में कालामासी
झाबुआ मूल के कड़कनाथ मुर्गे को स्थानीय जुबान में कालामासी कहा जाता है। इसकी त्वचा और पंखों से लेकर मांस तक का रंग काला होता है। कड़कनाथ प्रजाति के जीवित पक्षी, इसके अंडे और इसका मांस दूसरी कुक्कुट प्रजातियों के मुकाबले काफी महंगी दरों पर बिकता है।

कोलेस्ट्राल कम प्रोटीन ज्यादा
कड़कनाथ के मांस में दूसरी प्रजातियों के चिकन के मुकाबले चर्बी और कोलेस्ट्रॉल काफी कम होता है। झाबुआ वंशी मुर्गे के गोश्त में प्रोटीन की मात्रा अपेक्षाकृत ज्यादा होती है। कड़कनाथ चिकन की मांग इसलिये भी बढ़ती जा रही है, क्योंकि इसमें अलग स्वाद के साथ औषधीय गुण भी होते हैं।

क्या होगा फायदा 
जीआई प्रमाणनन के कारण कड़कनाथ मुर्गे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कारोबारी पहचान भी हासिल होगी जिससे इसके निर्यात के रास्ते खुल सकते हैं। इस चिन्ह के कारण झाबुआ के कड़कनाथ चिकन के ग्राहकों को इस मांस की गुणवत्ता का भरोसा मिलेगा। वहीं नक्कालों के खिलाफ पुख्ता कानूनी संरक्षण हासिल होगा।

क्या है जीआई पंजीयन 
जीआई पंजीयन का चिन्ह विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाले ऐसे उत्पादों को प्रदान किया जाता है जो अनूठी खासियत रखते हैं।
320 उत्पादों को भारत में अभी तक मिल चुका है जीआई प्रमाणनन
2017 के नवंबर में बंगाल के रसगुल्ला को दिया गया था जीआई प्रमाणन।

इन्हें मिल चुका है जीआई
महाबलीपुरम की पत्थर की मूर्तियां (2018), बनारसी साड़ी (2009), चंदेरी की साड़ी, कांचीपुरम का सिल्क, दार्जिलिंग चाय और मलिहाबादी आम, महाबलेश्वर की स्ट्राबेरी, नासिक के अंगूर शामिल हैं इस सूची में।