1 साल के लिए गया था चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर, जानिए कैसे 7 साल तक करता रहेगा काम

चार दिन हो गए हैं चांद पर विक्रम लैंडर को गिरे हुए. इसरो (Indian Space Research Organisation – ISRO) के वैज्ञानिक लगातार उससे संपर्क साधने की कोशिश कर रहे हैं. विक्रम लैंडर से संपर्क होगा या नहीं ये तो बाद में पता चलेगा, लेकिन इसरो वैज्ञानिक और खुद इसरो चेयरमैन डॉ. के. सिवन भी इस बात का दावा कर चुके हैं कि चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर चांद के चारों तरफ 7 साल से ज्यादा समय चक्कर लगा सकता है. लेकिन क्या आपको पता है कि यह दावा किस आधार पर किया है…

ये आधार है ऑर्बिटर का ईंधन, जो लॉन्च के समय करीब 1697 किलो था. अभी ऑर्बिटर में करीब 500 किलो ईंधन है जो उसे सात साल से ज्यादा समय तक काम करने की क्षमता प्रदान करता है. लेकिन, यह अंतरिक्ष के वातावरण पर भी निर्भर करता है कि वह कितने साल काम करता है. क्योंकि, अंतरिक्ष में आने वाले पिंडों, सैटेलाइटों, तूफानों और उल्कापिंडों से बचने के लिए ऑर्बिटर को अपनी कक्षा में बदलाव करनी पड़ेगी. ऐसे में ईंधन खत्म होगा और ऑर्बिटर का जीवनकाल कम हो जाएगा.

आइए जानते हैं कि आखिर किस कारण से ऑर्बिटर तय समय से ज्यादा काम करेगा

चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर फिलहाल चांद की कक्षा में 100 किलोमीटर की दूरी पर सफलतापूर्वक चक्कर लगा रहा है. 22 जुलाई को लॉन्च के समय ऑर्बिटर का कुल वजन 2379 था. इसमें ईंधन का वजन भी शामिल है. बिना ईंधन के ऑर्बिटर का वजन सिर्फ 682 किलो है. यानी इसमें लॉन्च के समय 1697 किलो ईंधन था. लॉन्च के बाद जीएसएलवी-एमके 3 रॉकेट ने ऑर्बिटर को पृथ्वी से ऊपर 170×39120 किमी की अंडाकार कक्षा में पहुंचा दिया था. इसके बाद ऑर्बिटर को अपनी यात्रा खुद के ईंधन के बल पर आगे बढ़ना था.

ऑर्बिटर ने यह काम भी बखूबी किया. अपने ईंधन के बल पर उसने पहले पृथ्वी के चारों तरफ 14 दिनों में (24 जुलाई से 6 अगस्त तक) ऑर्बिटर ने पांच चक्कर लगाए. फिर ऑर्बिटर को चांद की कक्षाओं में जाने के लिए 14 अगस्त को ट्रांस लूनर ऑर्बिट में डाला गया. यहां उसे लंबी यात्रा करनी थी. इसके बाद, 20 अगस्त को उसे चांद की कक्षा में डाला गया. फिर 1 सितंबर तक चांद के चारों तरफ ऑर्बिटर ने पांच बार अपनी कक्षाओं में बदलाव किया. पृथ्वी हो या चांद हर बार कक्षा के बदलाव में ईंधन की खपत हुई.

45 दिनों में कुल 2 घंटे 49 मिनट ऑन हुआ ऑर्बिटर का इंजन

आप पूछेंगे कि ऑर्बिटर का ईंधन खर्च कहां हुआ. 22 जुलाई से लेकर 4 सितंबर तक ऑर्बिटर करीब 2 घंटे 49 मिनट तक ऑन किया गया. यानी पृथ्वी की पांचों कक्षाओं और चांद की पांचों कक्षाओं में अपनी स्थिति बदलने के लिए 8970 सेकंड तक ऑन किया गया. यानी करीब 2 घंटे 49 मिनट तक इंजन ऑन किया गया. हर बार कक्षा में बदलाव करने में उसका ईंधन खर्च हुआ. इसलिए अभी, जब वह चांद के चारों तरफ चक्कर लगा रहा है, तब उसके पास करीब 500 किलो ईंधन है.

ऑर्बिटर में कुल 8 पेलोड्स हैं जो ISRO को चांद की सतह पर होने वाली घटनाओं की जानकारी देगा. आइए, जानते हैं इन पेलोड्स के बारे में…

Terrain Mapping Camera 2 (TMC 2)

टेरेन मैपिंग कैमरा का इस्तेमाल चंद्रयान-1 में भी किया गया था. यह चांद की सतह का हाई रिजोल्यूशन तस्वीर ले सकता है. यह चांद की कक्षा से 100 किमी की दूरी से चांद की सतह पर 5 मीटर से लेकर 20 किमी तक के क्षेत्रफल की तस्वीर लेने में सक्षम है.

सॉफ्ट X-Ray स्पेक्ट्रोमीटर (CLASS)

यह पेलोड चांद के X-Ray फ्लूरोसेन्स (XRF) स्पेक्ट्रा के बारे में जानकारी देगा. यानी चांद की सतह पर मैग्नेशियम, एल्युमीनियम, सिलिकॉन, कैल्सियम, टाइटैनियम, आयरन और सोडियम जैसे धातुओं की जानकारी लेगा.

सोलर X-Ray मॉनिटर (XSM)

ये पेलोड सूर्य और इसके कोरोना से निकलने वाले X-Ray के जरिए सूर्य के रेडिएशन की तीव्रता नापेगा. साथ ही ऑर्बिटर की ऊर्जा बनाए रखने में भी मदद करेगा.

ऑर्बिटर हाई रिजोल्यूशन कैमरा (OHRC)

ये पेलोड चांद की सतह पर 1 फीट की ऊंचाई तक की हाई रिजोल्यूशन की तस्वीर ले सकता है. इसका पहला काम लैंडिग साइट की DEM (डिजिटल एलिवेशन मॉडल) को जेनरेट करना है. इसी ने विक्रम लैंडर की तस्वीर ली है.

इमेजिंग IR (इंफ्रा रेड) स्पेक्ट्रोमीटर (IIRS)

इस पेलोड के दो मुख्य काम हैं- पहला, ये चांद की ग्लोबल मिनिरलोजिकल और वोलटाइल मैपिंग करेगा. दूसरा, ये पानी या पानी जैसे पदार्थ का कम्प्लीट कैरेक्टराइजेशन करेगा.

ड्यूल फ्रिक्वेंसी सिन्थेटिक अपर्चर रडार (DFSAR)

इस पेलोड के तीन मुख्य काम हैं. पहला- ये चांद के पोलर रीजन के हाई रिजोल्यूशन मैपिंग करेगा. दूसरा- ये पोलर रीजन पर मौजूद पानी या बर्फ के बारे में बताएगा. तीसरा- ये रिगोलिथ की मोटाई और इसके फैलाव के बारे में जानकारी देगा. चंद्रयान 2 में इस्तेमाल किया गया यह पेलोड चंद्रयान-1 में इस्तेमाल किए गए पेलोड से ज्यादा अपग्रेडेड है.

एट्मोस्फेरिक कॉम्पोजिशनल एक्सप्लोरर (CHACE-2)

इस पेलोड का इस्तेमाल चंद्रयान-1 के लिए किए गए पेलोड से अपग्रेडेड है. ये चांद के न्यूट्रल एक्जोस्फेयर और इसकी वेरिएबिलिटी के बारे में पता लगाएगा.

ड्यूल फ्रिक्वेंसी रेडियो साइंस (DFRS)

ये पे लोड चांद के लूनर आयोनोस्फेयर के बारे में अध्ययन करेगा. इसके अलावा ये धरती के डीप स्टेशन नेटवर्क रिसीवर से सिग्नल रिसीव करता है.

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