10 सरकारी बैंकों के विलय की राह में कौन-सी चुनौतियां हैं?

सरकार को उम्मीद है कि बैंकों के महाविलय से भारतीय अर्थव्यवस्था की सुस्ती दूर करने और 2024 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी। बैंकों के इस मेगा मर्जर प्लान के कई फायदे हैं तो इस राह में कुछ चुनौतियां भी हैं।

हाइलाइट्स

  • विलय से इन बैंकों के बही-खाते मजबूत होंगे यानी इनके पास लोन देने के लिए ज्यादा पैसे होंगे
  • बैंकों को कोर टेक्नॉलजी, फाइनैंशल प्रॉडक्ट्स और ऐप्लिकेशन के एकीकरण में ही दो से तीन साल लग सकते हैं
  • एक बड़ी चुनौती यह भी है कि बैंक की किन शाखाओं को चालू रखना है और किन्हें बंद रखना है
  • बैंकों की कार्य संस्कृति भी अलग है, लिहाजा कर्मचारियों को एक सूत्र में पिरोने की चुनौती भी रहेगी
  • फायदे
    विलय का ऐलान करते समय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने सबसे मजबूत तर्क इन बैंकों की लोन देने की क्षमता में सुधार का दिया था।

    बही-खाते मजबूत होंगे : सरकार का मानना है कि प्रस्तावित विलय से इन बैंकों के बही-खाते मजबूत होंगे यानी इनके पास लोन देने के लिए ज्यादा पैसे होंगे। उदाहरण के लिए, ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स और यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया को अपने साथ मिलाने के बाद पीएनबी का कारोबार करीब 17.95 लाख करोड़ रुपये का होगा और वह एसबीआई के बाद देश का दूसरा बड़ा बैंक बन जाएगा। इसी तरह सिंडिकेट बैंक को अपने साथ मिलाने के बाद कैनरा बैंक का कारोबार 15.20 लाख करोड़ का हो जाएगा। वहीं आंध्र बैंक और कॉरपोरेशन बैंक को अपने साथ मिलाने के बाद यूनियन बैंक ऑफ इंडिया का कारोबार 9.03 लाख करोड़ रुपये का हो जाएगा। इलाहाबाद बैंक को इंडियन बैंक में मिलाने से बनने वाले बैंक का बिजनस करीब 8.08 लाख करोड़ का होगा।

    इंडियन बैंक को छोड़कर बाकी सभी ऐंकर बैंकों का कैपिटल ऐडिक्वेसी रेशियो उनमें मिलाए जाने वाले बैंकों से कम है, लिहाजा विलय से ऐंकर बैंकों का यह रेशियो बेहतर होगा। इस रेशियो का ज्यादा होना बैंक की मजबूती का संकेत होता है।

  • क्रेडिट फ्लो बढ़ेगा : सरकार ने इन बैंकों में 52,250 करोड़ रुपये की अतिरिक्त पूंजी डालने का भी ऐलान किया है। इससे देश में क्रेडिट फ्लो बढ़ेगा। साथ ही विलय के बाद इन बैंकों के पास काफी संसाधन होंगे, जिसके इनकी कर्ज देने की लागत भी घटेगी।

    संकट का सामना होगा आसान : बड़े बैंक होने का एक और फायदा यह भी है कि वे अर्थव्यवस्था में अचानक आने वाले किसी संकट को आसानी से सह सकते हैं। साथ ही वे बढ़ते साइबर हमलों और ऑनलाइन फ्रॉड से अपना सिस्टम सुरक्षित रखने के लिए नई तकनीकों पर खुलकर निवेश कर सकेंगे।

    चुनौतियां
    सबसे बड़ी चुनौती टेक्नोलॉजी और ह्यूमन रिसोर्स के एकीकरण की है।

    टेक्नॉ़लजी के स्तर पर चुनौती : ऐनालिस्टों के मुताबिक, बैंकों को सिर्फ कोर टेक्नॉ़लजी, फाइनैंशल प्रॉडक्ट्स और ऐप्लिकेशन के एकीकरण में दो से तीन साल लग सकते हैं। हालांकि वित्त सचिव राजीव कुमार ने बताया था सरकार ने विलय के समय यह ध्यान रखा है कि उन्हीं बैंकों का आपस में विलय हो, जो एक ही टेक्नॉलजी या मिलती-जुलती टेक्नॉलजी पर काम कर रहे हों। इससे यह चुनौती कम नहीं होती है क्योंकि सभी बैंकों के फाइनैंशल प्रॉडक्ट्स अलग-अलग हैं। ऐसे में इनके एकीकरण के लिए उन्हें कोर टेक्नॉलजी, बैक-एंड टेक्नॉलजी और ऐप्लिकेशन में कस्टमाइजेशन की जरूरत पड़ेगी।

    ज्यादा कर्ज देने से परहेज की सलाह : विलय से बड़े बैंक बनने पर बड़े कर्ज देने की क्षमता बढ़ सकती है, लेकिन RBI का नियम कहता है कि बैंकों को बड़े बॉरोअर्स को ज्यादा कर्ज देने से परहेज करना चाहिए क्योंकि इससे जोखिम भी बढ़ता है।

    HR और वर्क कल्चर की चुनौती : एक चुनौती एचआर और कार्य करने की संस्कृति के एकीकरण की भी है। प्रस्तावित विलय में शामिल लगभग सभी बैकों की देशभर में उपस्थिति है। ऐसे में इनके सामने एक बड़ी चुनौती यह भी है कि बैंक की किन शाखाओं को चालू रखना है और किन्हें बंद रखना है क्योंकि कई जगह पर इन बैकों की शाखाएं आस-पास हैं। इन बैंकों को अनिवार्य रूप से चीफ रिस्क ऑफिसर के पद पर बाहर से लोगों को लाना होगा। बैंकों के अधिकारी इसका भी विरोध कर सकते हैं। बैंकों की कार्य संस्कृति भी अलग है, लिहाजा कर्मचारियों को एक सूत्र में पिरोने की चुनौती भी रहेगी।

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